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About Brahmins

ब्राह्मण क्या थे, क्या हो गये, अब क्या होगा

 

डॉ.आशुतोष उपाध्याय

आखिर ब्राह्मण कौन थे और समाज में उनको इतना उँचा स्थान क्यूं प्राप्त था। आखिकार शक्ल सूरत और दिमाग में तो वो शेष लोगों की तरह ही थे फिर इतना सामाजिक सम्मान क्यूं मिला हुआ था, कोई भी कौम या किसी समुदाय का 1 वर्ग, शेष समुदाय को हज़ारों साल तक मूर्ख नहीं बना सकता। इसलिए यह तो मानना ही पड़ेगा की इतिहास के किसी काल में ब्राह्मणों ने जरूर कुछ ऐसा किया होगा की उन्हे शेष समाज ने इतना उच्च स्थान दिया। 

अगर हम भारतीय इतिहास को वैदिक काल से शुरु करें तब से आज तक के 5000 साल या उससे भी अधिक के इतिहास में धर्म, साहित्य, आध्यात्म, संगीत, राजनीति से लेकर युद्ध कौशल और सेना में और विदेशी आक्रमण से शस्त्र से लेकर और आध्यात्मिक प्रतिरोध तक हर जगह ब्राह्मणों का योगदान है। अगर वैदिक काल में जाएं तो ब्राह्मणों का मुख्या काम था आश्रमों की स्थापना और शास्त्र और शस्त्रा की शिक्षा देना (प्रायः लोग यह सोचते हैं कि ब्राह्मण सिर्फ किताबी ज्ञान देते थे वो सही नहीं है। उस समय आश्रमों में राजपुत्रों और ब्राह्मणों को शस्त्रयुद्ध कौशल की शिक्षा भी दी जाती थी। महाभारत काल में द्रोण और परशुराम इसके उदाहरण हैं।

 सोचने की बात है जो राजकुमार 25 वर्ष की उम्र तक गुरुकुल मे रहते थे वो सिर्फ शास्त्र की शिक्षा कैसे ले सकते थे ( उन्हें शस्त्रों की शिक्षा भी गुरुकुल में ही मिलती थी) पर इस शिक्षा देने के बदले में ब्राह्मणों को जीविका के लिये भिक्षावृत्ति पर ही निर्भर रहन पड़ता था। यह सामाजिक व्यवस्था इसलिए बनाई गयी थी जिससे शिक्षा व्यवसाय ना बने और शिक्षक लालची और लोभी ना होकर सबको समान रूप से ज्ञान दें। अब अगर कोई भी व्यक्ति समाज में इतना बड़ा त्याग करेगा तो उसे सम्मान मिलेगा ही।

वैदिक काल के ब्राह्मणों की उच्च बौद्धिक क्षमता का पता उपनिषद को पढ़कर और समझ कर लगाया जा सकता है मानव इतिहास में में इतने उच्च कोटि की आध्यत्मिक बौद्धिक क्षमता का उदाहरण और कहीं नही है। शायद भारत की अंग्रेज़ों से आज़ादी के पहले का कुछ अपवादों को छोड़कर पूरा साहित्य ब्राह्मणों के द्वारा ही लिखा गया है। इसी तरह चिकित्सा विज्ञान में आज से हज़ारों साल पहले भारत में कई जटिल ऑपरेशन किए जाते थे जिन्हें आज भी चिकित्सा विज्ञान मान्यता देता है।

 संगीत में तन्ना पाण्डेय (तानसेन) या बैजू बावरा(बैजनाथ चतुर्वेदी) अमर नाम है। हालांकि संगीत की उत्पत्ति सामवेद से ही हो गयी थी पर इसका श्रेय भी ब्राह्मणों को जाता है। भारत पर विदेशी आक्रमण का पुराना इतिहास रहा है एक शक्तिशाली भारत के निर्माण और विदेशी आक्रमण का सामना करने के लिये चाणक्य-पुष्पमित्रा से लेकर माधवाचर्या विद्यारण्या तक- और उसके बाद मुग़लकाल में भी तुलसीदास एवं अन्या संतों ने हिन्दुओं को धर्म से जुड़े रहने में अहम योगदान दिया और यह बात ब्रिटिश राज के दौरान अंग्रेज़ों के खिलाफ किये गये संघर्ष में भी देखी जा सकती है।

 

परंतु ऐसा नही है की सब कुछ इतना ही सुन्दर और शालीन था जितना दिखता है। आप किसी व्यक्ति,वर्ग या समाज को कितना भी आदर्शवादी क्यूं ना बनाएं लोभ, मोह और स्वार्थ से सभी का ऊपर उठ पाना संभव नही होता और यही उत्तर वैदिक काल के ब्राह्मणों के साथ हुआ। पुराणों में भृगु की शिव के गणों के द्वारा दाढ़ी-मूछ उखाड़ कर अपमानित करने का जिक्र है। क्योंकि भृगु ने सत्ताधारी और धनवान दक्ष का साथ दिया था। इसी प्रकार महाभारत में द्रोणाचार्य का धन के लालच में राजगुरु बनना और कुछ विद्याओं का चोरी-छुपे सिर्फ अश्वत्थामा को ज्ञान देना इसका उदाहरण है।

भारतीय समाज में यहीं गलती हुई आदर्शवाद के शिखर पर बैठे ब्राह्मणों में लालच और भौतिक सुखों के मोह और उनसे सिर्फ अपेक्षा रख कर आए दिन अपमानित करने वाले समाज की वजह से सामाजिक गिरावट आई (राजा नहुष द्वारा सप्तऋषियों से पालकी उठवाने से लेकर, जमदाग्नि-रावण-वृत्तासुर की हत्या और चाणक्य को अपमानित कर राजमहल से बाहर फिंकवाने की घटनाएं और ऐसी ही बहुत सारी घटनाएं इसका उदाहरण हैं ) । यह  गिरावट हालांकि उत्तर वैदिक काल से लेकर मौर्य वंश तक कम थी परंतु उसके पश्चात बौध धर्म के बढ़ते प्रभाव की वजह से नए और कठोर सामाजिक नियम बढ़ने लगे और साथ ही साथ निचली जातियों पर अत्याचार की प्रेरणा भी और यह उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहा और मुग़ल काल में और विकृत हो गया।

लगातार चल रहे दुष्प्रचारों से अपने इतिहास के साथ साथ ब्राह्मणों ने अपना आत्म सम्मान और मर्यादा भी पूरी तरह खो दी। वैसे भी ब्राह्मण कोई शारीरिक संरचना या असाधारण तीक्ष्ण बुद्धि की वजह से नही त्याग और समाज के लिए समर्पण की वजह से सम्माननीय थे ।आधुनिक भारत में की आधुनिक परिस्थितियों में ब्राम्हण कहे जाने वाले वैदिक ब्राह्मणों के संस्कारों और सम्मान का पूरि तरह लोप हो गया है। हां इस जातिय नाम की वजह से नौकरी और अन्य सरकारी सुविधाओं में जो भेदभाव का सामना करना पड रहा है वो अलग। अब यह समय ही बताएगा कि आगे चलकर समाज क्या रूप लेगा।

राह्मणों की वर्तमान स्थिति:- आधुनिक भारत के निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों जैसे साहित्य, विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी, राजनीति, संस्कृति, पाण्डित्य, धर्म में ब्राह्मणों का अपरिमित योगदान है। प्रमुख क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों मे बाल गंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद इत्यादि हैं। लेखकों और विद्वानों में कालिदास, रबीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। धीरे धीरे अंग्रेजी हुकूमते अपने राज फेला रही थी वही एक और कुछ ब्राह्मण ऐसे भी थे जो गुरुकुल व्यवस्था और वैदिक धर्म की पूर्ण रक्षा के लिए जीतोड़ कोशिश में लगे थे परन्तु जब अंग्रेजो की समझ आया की ये गुरुकुल व्यवस्था भारत के स्वाभिमान और आत्मसम्मान की हड्डी हे तो उन्होंने इसे तोड़ने का मन बना लिया और अपने कही ब्रिटिश विद्वान को लन्दन से बुलाया जिसमे लार्ड मेकाले, राल्फ ग्रिफिथ जेसो को भारत बुलाया और श्री ग्रन्थ वेदों के अंग्रेजी अनुवाद के नाम पर उसमे छेड़छाड़ करी गयी हालाँकि जो वैदिक वेद हे वो आज भी उसी स्वरुप में हे अंग्रेजी अनुवाद से हिंदी में बदले गए वेदों में अंग्रेजो द्वारा कुछ बदलाव किये गए. जो वैदिक वेद है वो आज भी उसी स्वरुप में है. एक और जहा बड़ी तेजी से ब्रिटिश विद्वान वेदों का अनुवाद कर रहे थे दूसरी तरफ गुरुकुल बंद करवा कर कान्वेंट की स्थापना हो रही थी, अंग्रेजी संस्कृति को स्थापित कर वैदिक संस्कृति को मिटाया जा रहा था क्यों की अंग्रेजो को समझ आ गया भारत की मजबूती यहाँ की संस्कृति हे, कल तक जो अंग्रेज भारत में रहके हिंदी बोलते थे आज उन्होंने अंग्रेजी को फेलाने पे जोर दिया और हिंदी का हास होता गया उसी में ब्राह्मण अगर अपने कर्तव्यों को समझकर वेदों के रक्षा के लिए उतर जाते तो शायद वैदिक संस्कृति का इतना हास नहीं होता.आजाद भारत में ब्रह्मिनो का महत्व और सम्मान उतना ही गिरा क्यों की ब्राह्मण अपने कर्मो के विरुद्ध अनेक कार्यो में जा घुसे थे, कही व्यापर तो कही रंगमंचो पर जा पहुचे तो दूसरी तरफ जातीय व्यवस्था चरम पर जा पहुची. कर्म से ब्राह्मण भटक रहे थे तो विधर्मी और अज्ञानी लोगो ने धर्म का धंधा शुरू कर दिया अंधाधुंध भगवन के नाम पर पाखण्ड बढ़ता गया, एक तरफ ब्राह्मण जो कल तक समाज को वेदों के विज्ञानं से परिचित करवाते थे उनके रहते हिन्दू धर्म में अन्धविश्वास ने जगह बना ली, गली गली बाबा बेठने लगे गली गली व्यापारी आ बेठे मात्र ब्रह्मिनो के अपने कर्म विमुख होने से धर्म का भयकर हास हो रहा था.

वैदिक धर्म के इसी हास को लेकर मह्रिषी दयानंद जी ने आर्य समाज की स्थापना की ताकि पाखण्ड और अंधविश्वास को दूर किया जा सके, कही धर्म सुधार आन्दोलन हुए परन्तु ब्रह्मिनो की नजरंदाजी के कारण विफल होते गए और आन्दोलन खुद भ्रष्ट होते गए. धीर धीरे आरक्षण जेसी व्यवस्था से शिक्षण पर असर पड़ना शुरू हुआ तब ब्रह्मिनो के सर पे भार आके गिरा जिसको हटाने के लिए ब्रह्मिनो ने पूरी तरह अपने आप को आज के युग में ढाल कर वैदिक सभ्यता,संस्कार और वेदों को पीछे छोड़ दिया.वैदिक धर्म के 4 हिस्से हे जिसे वर्ण कहा गया हे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र धर्म में चारो का अपना महत्व हे, जब भी इनमे से कोई हिलता गिरता हे तो उसके पीछे सभी गिरते जाते हे. क्षत्रिय वर्ण से जैन, बोद्ध और सिख धर्म बने तो वैदिक मतों का हास हुआ ब्रह्मिन वर्ण से उनके कर्म विमुख हुए तब पाखण्ड का विस्तार हुआ अब शुदो के प्रति नकारत्मक व्यवहार से देश में आरक्षण जेसी व्यवस्था सभी झेल रहे हे जो किसी का भला नहीं कर सकती.

ब्रह्मिनो को समझना होगा, युवाओ को जागना होगा अगर आज नहीं संभले तो कल कही के नहीं रहेंगे. जरा सोचिये आप किस कुल में जन्मे हे उसका महत्व क्या हे, उसका सम्मान क्या और क्या ये जन्म फिर से मिलेगा. बेशक आप बड़े डॉक्टर, इंजिनियर, सीए बन जाओगे परन्तु अगर भगवान को मानते हो तो ये याद रखना उसी इश्वर ने आपको ब्राह्मण की डिग्री दी हे आपकी जिम्मेदारी हे धर्म की रक्षा और ज्ञान की रक्षा आप अपने उस कर्त्तव्य से पीछे नहीं हट सकते.

आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है। यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके तो सभी हमेशा से ऊंची पदवी पर बैठे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता? अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढने का मौका सबको मिल जाता है। कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा। ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन सुन कर ग्लानि से इतना झुक चूका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है। बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है आज का ब्राह्मण। नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण। आज बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं । बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ना प्रत्येक ब्राह्मण का कर्तव्य है ताकि ब्राह्मण जाती का भविष्य सुनिश्चित हो सके, इसके लिए प्रयास होना अन्यंत आवश्यक है.