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हमारे देश में संयुक्त परिवार की प्रथा रही है, जहाँ से हमें खाने-पीने में आयुर्वेद का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होता था। छोटीमोटी तकलीफ यू ही ठीक हो जाया करती थी। घर का बुजुर्ग महिलाओं में एक क्लिनिकल सेंस था, हमारे चेहरे हावभाव को देखकर ही वह समझ जाती थी और घरेलू चिकित्सा हमें बिना बोले ही मिल जाती थी। जैसे सर्दी जुकाम है तो हमारी चाय में हमारे बिना बोने ही अदरक लोंग डाल देना।

दादी-नानी कहानी-किस्सों के माध्यम से जीवन में आने वाले संकटों-संघर्षों से जूझने के तरीके सिखा देते हैं, इससे बच्चों के मन में चुनौतियों का डटकर सामना करने का भाव और शक्ति स्वाभाविक रूप से आ जाती है। वास्तव में यह भावी जीवन में स्वाभाविक रूप से आने वाली कठिन और विपरीत परिस्थितियों के प्रति कहानियों के माध्यम से किया गया मानसिक टीकाकरण है।

आजकल पति पत्नि दोनों ही नोकरी करते हैं जो अपने बच्चों के साथ बड़े शहरों में फ्लेट में रहते हैं। जरा-सी परेशानी होने पर घबरा जाते हैं। आयुर्वेद क्या और केसा था इस पर ध्यान देना आवश्यक है। घर में खाने के मसाले हो या ज्यूस मौसमी सब्जियाँ, फ्रूट्स हो या गर्म हल्दी का दूध हो। सिरदर्द, पेटदर्द, खराब खट्टी डकारें, हिचकी, दात दर्द, मुंह के छाले, कानदर्द, गला बैठा, कांटा निकालना, खुजली, जलने पर, पांव की बिवाई, बच्चों की मालिश हो या साफ सफाई, हो या उपवास रखा जाये। घर की शाम की धूप (दिया-बत्ती) दोनों वक्त जब मिलते हैं जैसे शाम का समय तब दिया बत्ती का समय होता है धूप गाय के गोबर के कण्डे पर गाय का देसी घी डालकर जलाई जाती है जिसमें कई प्रकार की वनस्पतियाँ धूप में डाली जाती हैं जिससे कई रोगनाशक वनस्पतियाँ होती हैं। जिससे किटाणु वायरस समाप्त हो जाते हैं यह सब बिना बोले घर में चलता रहता था। घर में धनात्मकता आती थी। पर अब सब बदल रहा है। आज कैमिकल की अगरबत्तीयाँ जलाई जाती हैं।

आपको अपने बारे में सतर्क रहने तथा आत्म-निरीक्षण करने को कहा गया है जिससे आपको सम्पूर्ण जीवन-शैली जीने की प्रेरणा मिले। प्रायः हम यह जानते हैं कि हमारे चारों ओर के संसार में क्या हो रहा है, लोग केसा व्यवहार कर रहे हैं और उनके व्यवहार की शैली हमें किस प्रकार प्रभावित कर रही है। हम विश्व में होने वाले राजनीतिक परिवर्तनों से भी अवगत हैं। भूचाल, बाढ़ तथा ऐसी ही अन्य घटनाओं से भी हम अवगत रहते हैं। परन्तु हम अपने अंदर होने वाले परिवर्तन, स्थानांतरण, विरूपण आदि से परिचित नहीं हो पाते। दूसरे शब्दों में यह समस्त विवरण आपके अंदर शारीरिक तथा मानसिक स्तर पर चेतना जागृत करने के लिए है। आत्म – निरीक्षण का दूसरा उद्देश्य अपने प्रति सचेत होना है।

ब्रह्मांड में हर वस्तु एक-दूसरे से जुड़ी है और सारा घटनाक्रम एक लय के साथ चलता है जिसके साथ आपको ताल में रहने का पूरा प्रयास करना चाहिए। इस ब्रह्मांडीय संगीत का अनुसरण करने के लिए सबसे पहले आपको अपने शारीरिक तथा मानसिक अस्तित्व से अच्छे संबंध स्थापित करने होगे। इसके बाद आपको अपने निकटवर्ती संसार तथा विशाल पर्यावरण से सामंजस्य स्थापित करना होगा। शुद्ध पर्यावरण, वृक्ष मानसिक प्रदूषण दूर करते हैं। कुछ लोग काम से व्यस्तता, लापरवाही अथवा आलस्य के कारण प्राकृतिक आवेगों को दबा देते हैं। कई घंटे चलने वाली बैठकों के बीच से प्राकृतिक आवेगों की निवृत्ति के लिए प्रायः लोग यह सोचकर नहीं उठते कि दूसरे क्या सोचेंगे। यदि ऐसे आवेगों को घंटों रोकना पड़ जाए तो उसके परिणाम बड़े घातक हो सकते हैं। चरक ने लिखा है कि “पंडित, राजदरबार के कर्मचारी, नगर-वधू तथा व्यापारी प्रायः रोगी होते हैं वे सदैव तीव्र प्राकृतिक आवेगों को दबाते हैं, भोजन समय पर नहीं करते, असमय मल-त्यग के लिए जाते हैं तथा असमय भ्रमण करते हैं। इस प्रकार व्यवहार करने वाले अन्य लोग भी स्वस्थ नहीं रह पाते।”

लोग प्रायः उन आवेगों को दबाने पर विवश हैं जो दबाये नहीं जा सकते। इस प्रकार वे रोगों को आमंत्रित कर रहे हैं तथा अपनी आयु को छोटी करते जा रहे हैं। अपनी अति व्यस्तता-भरी दौड़ के बीच उनको चाहिए कि वे एक क्षण के लिए ठहरें और अपने-आपसे पूछें – “मैं यह सब क्यों कर रहा हूँ? मैं ये सब जीवन-विरोधी कार्य क्यों कर रहा हूँ?” उपलब्धियों, तरक्की आदि के पीछे दौड़ने का तब क्या अर्थ है जब जीवन खतरे में हो (रोगों के कारण) तथा आयु ही कम हो रही हो! याद रखिए, जीवन की प्रथम प्राथमिकता जीवन ही होना चाहिए। जीवन समाप्त हो गया तो सब कुछ समाप्त हो गया। लोभ के बादलों से ढका मस्तिष्क यह भूल जाता है कि हम राम, मोहन, राधा, कमला, श्याम आदि नामधारी इस पृथ्वी पर हमेशा नहीं रहेंगे। हमारा यहाँ रहना स्थायी नहीं, अस्थायी है। अतः बड़े-बड़े सुखों के लिए संघर्ष करने के स्थान पर जीवन के छोटेछोटे सुखों में ही अपनी खुशियाँ ढूँढ़ना बुद्धिमानी है। जीवन की यात्रा हमें अधिक दूर नहीं ले जा सकती, वह सीमित है। यह पहाड़ों में एक पदयात्रा करने के समान है। यात्रा का उद्देश्य प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेना है, न केवल लक्ष्य तक पहुँचना।

सभी प्राचीन सभ्यताओं के धार्मिक तथा चिकित्सा कार्यों में प्रकृति-पूजा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह प्रकृति के साथ रहने, उसका एक अंग बनने, उसके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने तथा ब्रह्मांड से अपने संबंध को पहचानने का एक मार्ग था।

थकान अपने-आपमें को रोग नहीं है परन्तु यदि इसे दूर न किया जाए तो इससे अनेक गंभीर स्वास्थ्य-समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। जैसे तरह-तरह के दर्द, खास तौर से सिरदर्द, आधासीसी का दर्द, कमर का दर्द आदि। थकान आदि लगातार बनी रहे तो यह शरीर को इतना कमजोर बना देती है कि बाह्य संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है तथा रोग से मुक्ति पाने की शरीर की सामान्य क्षमता कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त थकान क्रोध और चिड़चिड़ाहट को जन्म देती है। इससे अपने चारों ओर का जीवन अच्छा नहीं लगता, साथ ही पेट का अल्सर, शरीर के किसी भाग में कड़ापन अथवा अन्य अन्तर्जात रोग हो जाते हैं। थकान के कारण इन्द्रियों का आपसी तालमेल गड़बड़ा जाता है। इससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है।

अधिक मानसिक कार्यों से भी थकान हो जाती है। समुचित विश्राम मन को शांति प्रदान करता है। सिर में दर्द के कई कारण हो सकते हैं – जैसे त्रिदोष, असंतुलन, कब्ज, तनाव, स्नायु की कमजोरी, व्यस्तता, अत्यधिक गर्म, ठंडा, शोरयुक्त, प्रदूषित वातावरण। वात-दोष से कब्ज हो जाता है तथा कब्ज वात को और बढ़ाता है। हल्के कब्ज से भी सिर में भारीपन हो जाता है। आधासीसी का दर्द हर समय नहीं रहता। यह तेज कपाल-दर्द है जिसके बाद मितली या उल्टी हो जाती है, चिड़चिड़ापन आ जाता है तथा प्रकाश अच्छा नहीं लगता। आधासीसी का दर्द प्रायः आधे सिर, आँख के आसपास, जबड़े तथा कनपटी में होता है। आधासीसी के रोगियों के मन में प्रायः यह बात बैठ जाती है कि यह दर्द कभी जा नहीं सकता। परन्तु इसकी वास्तविक चिकित्सा तो रोग के कारणों का नाश करना ही है।

आधासीसी अथवा कोई और पुराना दर्द जैसे गृध्रसी (टाँग का दर्द – Sciatica), कंधो का दर्द आदि किसी रोग के पूर्व लक्षण होते हैं। जिनकी हम उपेक्षा कर जाते हैं। इन लक्षणों को गंभीरता से लेना चाहिए जिससे स्वास्थ्य पर होने वाले रोग के आक्रमण से बचा जा सके। कई कारणों से यह पुराना रोग बन जाता है, जैसे संचित शरीर थकान, मानसिक तनाव, त्रिदोषों में असंतुलन जिससे शरीर की ऊर्जा कम हो जाती है तथा व्यक्ति कमजोर हो जाता है। जैसे यदि आप हल्के-से अपच से पीड़ित हैं परन्तु परवाह नहीं करते और पार्टियों में जाते हैं, डिनर लेते हैं और शायद भारी भोजन भी करते हैं। इससे अपच और बढ़ जायेगा, आप थकान से पीड़ित हो जायेंगे परन्तु फिर आप विश्राम नहीं कर पायेंगे। इस प्रकार आपने आराम, भोजन व चिकित्सा आदि पर ध्यान नहीं दिया। इसी बीच आपसे कोई मिलने आ सकता है, रात को देर तक काम करना पड़ सकता है या फिर मानसिक रूप से असंतुलन की स्थिति रह सकती है। इससे आप और अधिक थक जायेंगे और आपके शरीर से ऊर्जा का क्षरण होने लगेगा। आपका पित्त और शायद वात भी और अधिक दूषित हो जायेंगे क्योंकि आपके पेट में गड़बड़ी है। इस प्रकार यूँ ही चलता रहा तो प्रतिदिन आपकी शक्ति कम होती चली जायेगी और अंत में आपका शरीर विरोध करने लगेगा। यदि आपको पुराना आधासीसी या साइटिका का आक्रमण हो जाते है तो वह वास्तव में आपकी कमजोरी से हुआ है और दर्द के रूप में शरीर अपना विरोध प्रकट करता है।

कुछ लोग कमर-दर्द, गर्दन, कंधो , भुजा अथवा कलाई के दर्द से पीड़ित रहते हैं जिसके अनेक कारण हो सकते हैं। बैठने की गलत मुद्रा, तनाव, अधिक परिश्रम, चिन्ताएँ, असहायता का अनुभव आदि इन दर्दों के मुख्य कारण हैं। कभी-कभी कुछ लोग तनाव के कारण भी शरीर के किसी भाग में अकड़न महसूस करते हैं। कुछ लोग तंग और ऊँची एड़ी के जूते पहनते हैं, उनसे जो दबाव पड़ता है, उसके कारण घुटनों, टखनों आदि में दर्द होने लगता है। कलाई तथा कंधो का दर्द प्रायः अनचाही परिस्थितियों में रहने पर भी होने लगता है। जैसे कुछ लोगों को अपना काम पसंद नहीं आता और वे अप्रसन्न व असंतुष्ट रहते हैं। अतः उन्हें इस प्रकार का दर्द रहने लगता है।

पर्यावरण-प्रदूषण, कीटनाशकों व रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग तथा स्वास्थ्य को चुनौती देने वाले लाखों मामलों में हम ऐसे ही विवश होकर रह गये हैं। दिल्ली में भीड़ के समय गाड़ी चलाने में दम घुटने लगता है। वे लोग जो घंटों गाड़ियाँ चलाते हैं, इस प्रदूषित वातावरण को झेलने के लिए विवश हैं। अत्यधिक कार्बन, सीसे के कण, आक्सीजन की बेहद कमी होने के कारण ऐसे गंदे वातावरण में तरह-तरह के रोगों के कीटाणु और जीवाणु खूब पनपते हैं। ऊपर से महानगरीय जीवन की व्यस्तता-जनित थकान जो व्यक्ति का ओज कम कर देती है। टोकियो, मेक्सिको सिटी, कायरो, इस्तमबुल, न्यूयोर्क, बैंकौक, जकार्ता तथा संसार के अन्य महानगरों की स्थिति भी ऐसी ही है। आयुर्वेदिक परम्परा में सबसे अधिक बल तनाव और दबाव दूर करने पर दिया गया है तथा परिस्थितियों से सीधे निबटने की बात कही गई है। वैद्य तथा ज्ञानियों का विश्वास है कि चिन्ताएँ, शोक, दबाव, असहायता का अनुभव, भय आदि के परिणाम बड़े खतरनाक होते हैं – इनसे गंभीर रोग पैदा हो जाते हैं। ये काँटे है जो चुभेंगे और घायल कर देंगे। इसी तर्क के आधार पर किसी के आत्मीय के मरने पर उसे खुलकर रुलाने का प्रयत्न किया जाता है ताकि वह अंदर-ही-अंदर चोट खाकर न रह जाए। इसी उद्देश्य से ऐसे अवसरों पर कई प्रकार की रस्में सम्पन्न कराई जाती हैं। इनके माध्यम से मृतक के परिजनों को उसके चले जाने का पूरा अनुभव कराया जाता है तथा यह अनुभव भी कराया जाता है कि कोई यहाँ सदैव नहीं रहेगा। सबको एक-न-एक दिन ऐसे ही चले जाना है।

इस सम्पूर्ण चिकित्सा-पद्धति में अनेक सामाजिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक अवसरों पर सम्पन्न होने वाले अनुष्ठान भी हमें इस बारे में सचेत करते हैं कि हम क्या हैं तथा हमारे इस धरती – निवास के विभिन्न पक्ष क्या हैं? ये सभी अनुष्ठान स्वास्थ्य-सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, गर्भ-धारण करने पर जो उत्सव किया जाता है वह अहसास कराने के लिए है कि स्त्री को विशेष पौष्टिक पदार्थ दिये जाएँ। बच्चे के जन्म के बाद अनेक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिनमें गर्भाशय की शुद्धि के लिए औषधि तैयार करना, स्त्री के लिए दूध बढ़ाने वाली तथा कमजोरी दूर करने वाली औषधि तैयार करना आदि शामिल हैं। जब कोई व्यक्ति किसी खतरे से बच जाता है तो चढ़ावा चढ़ाने तथा उत्सव मनाने की प्रथा है। इस सबका क्या अर्थ है? जीवन देने के लिए ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के अतिरिक्त यह उत्सव निकट संबंधियों को उस दिन दहलाने वाली चोट का भी अनुभव कराता है, जो जीवन खतरे में पड़ जाने पर उन्हें झेलनी पड़ती है। केवल पूरी चेतना से अनुभव करने से ही छुपे हुए भय ऊपर लाये जा सकते हैं और उनसे मुक्ति पाई जा सकती है।

मानसून आने में देर हो जाए तो उसे आमंत्रित करने के लिए अत्यधिक वर्षा या आँधी – तूफान रोकने के लिए किसी-न-किसी रूप में पाँच महाभूतों की पूजा की जाती है। इस कार्य में तीर्थस्थानों का भी योगदान है। ये सब आयोजन जीवन की चेतना को अनुभव करने, इसकी सतत परिवर्तनशीलता को दर्शाने तथा बाह्य जगत् के साथ हमारी पारम्परिक निर्भरता का संबंध बताने के लिए किये जाते हैं। हम सभी जीवधारी विश्व तथा उसकी रचना करने वाले सभी अद्भुत कारकों के अंग हैं। जल, वृक्ष, पृथ्वी, आकाश, वायु, सूर्य की पूजा का अभिप्राय हमें इस सत्य का अहसास कराना है कि इस समूचे पर्यावरण के बीच हम सबका अस्तित्व किस प्रकार का और कैसे है। `आंतरिक’ और `बाह्य’ के बीच सामंजस्य उत्पन्न करना इसका ध्येय है। जैसे गुलाब, जुही, चमेली, लिली, चंदन आदि सारी दुनिया में पहचानी जाती हैं। लिंडन, शिरीष तथा नीबू, संगतरे आदि के पूâलों की रुचिकर एवं सूक्ष्म सुगंधि विश्व में इतनी चर्चित नहीं है परन्तु अत्यधिक उद्दीपक एवं भावोत्पादक हैं। व्यक्ति अपने-आपमें एक पूर्ण इकाई है तथा सतत परिवर्तनशील एवं गतिमान जगत का एक अंग है। मनुष्य टुकड़ों में नहीं जी सकता। ऐसा व्यक्ति जिसके पास बैठने और भोजन का आनंद लेने के लिए भी समय नहीं है, प्रायः जीवन के अन्य पक्षों के प्रति भी संवेदनशील नहीं होता।

यजुर्वेद में आभूषणों को अपशगुन दूर करने वाला बताया है। आभूषण धारण करने से बुरी आत्माओं से शरीर और मन की रक्षा होती है। आयुर्वेद के अनुसार सोने की प्रकृति गर्म है और चाँदी की शीतल। इसलिए यदि सिर में सोने के और पाँव में चाँदी के आभूषण धारण किये जाएँ तो सिर से उत्पन्न विद्युत नीचे की ओर चली जायेगी और पाँव वाली ठण्डी बिजली उसे अपनी ओर खींच लेगी।

संसार के पहले शल्य चिकित्सक सुश्रुत के अनुसार यदि कानों में छिद्र करके सोने या जस्ते की बालियाँ पहन ली जाएँ तो आँत उतरने, अण्डकोष बढ़ने तथा पसली का रोग लगने की संभावना नहीं रहती। हँसुली को गले में पहनने से नेत्र ज्योति बनी रहती है। अगूँठी धारण करने से मानसिक तनाव कम होता है। कफ सम्बन्धी विकारों में सोने की अँगूठी और पाचन संबंधी विकारों में चाँदी की अँगूठी लाभ करती है। अँगूठी पहनने से ऊँगलियों में शिथिलता नहीं आती। कमर, धनी, पीठ व कमर के दर्द से छुटकारा दिलाती है। नथ, बाली, लोंग नाक के रोगों में बचाव करती है। मासिक धर्म सम्बन्धी विकारों को दूर करती है। बिछियाँ पहनने से महिलाओं की प्रसव पीड़ा कम होती है। पायल पहनने से एड़ी व घुटने के दर्द से राहत मिलती है। वस्तुत: आभूषण धारण का एक्यूप्रेशर व एक्यूपंचर से परोक्ष सम्बन्ध है।

स्त्रियों के गहने कुछ इस प्रकार तैयार किये जाते हैं कि वे न केवल उनकी सुन्दरता को निखारें अपितु आकर्षक ध्वनियाँ उत्पन्न करें। पुरुष अपनी माँ, बहन या पत्नी को उसके गहनों-चूड़ियों, पायल, कान के बालों आदि की आवाजों के अन्तर को समझकर पहचान लेते हैं। अतः गहनों का निर्माण केवल स्त्री के सौंदर्य में वृद्धि करने के उद्देश्य से ही नहीं किया गया अपितु सुन्दर और आकर्षक ध्वनियाँ उत्पन्न करने का लक्षण भी उसमें निहित है। जब स्त्री अपने कंधे से सरकते पल्लू को बार-बार कंधे पर डालती है तो उसकी चूड़ियाँ खनक उठती हैं। चूड़ियों की खनक से पुरुष को उसकी प्रेयसी की उपस्थिति का आभास होता है। अत्यधिक उद्योगपरक तथा तकनीकी रूप से विकसित देशों तथा विश्व-भर के महानगरों में लोगों का जीवन मशीन की तरह हो गया है। आज जीवन में अत्यधिक कार्यशीलता है, तनाव, दबाव और बहुत दौड़-भाग है। पूर्व-निर्धारित तथा सुनिश्चित है। जीवन में उन्मुक्त प्रवाह के लिए स्थान नहीं रह गया है। झूमते पेड़ों, खिलते फूलो, चहचहाते पक्षियों, जल के कलरव तथा वायु की साँय-साँय, उगते चाँद और छुपते सूर्य का आनंद लेने के लिए अब न किसी के पास समय बचा है, न मानसिकता। महानगरों में रहने वालों को चंद्रमा की कलाएँ तथा तिथियाँ ज्ञात नहीं होतीं, वे प्रायः बन्द स्थानों में कृत्रिम प्रकाश तथा कृत्रिम जलवायु में काम करते हैं। यद्यापि उनके पास खाली समय होता है, परन्तु जीवन – शैली ही ऐसी है कि वह भी किसी – न -किसी काम की भेंट चढ़ जाता है। जब लोगों के दिमाग पर हर समय कुछ – न- कुछ करने का भूत सवार रहता है तो फुरसत का समय जैसी कोई चीज हो ही कैसे सकती हैं। दो साथियों के खुलकर मिलने जैसी प्राकृतिक सुन्दरता और भावुकता की अब इसमें गुंजाइश ही कहाँ बची है ! जैसे प्रायः हर शनिवार को खरीदारी के लिए निकलते हैं, उसी प्रकार सुख-प्राप्ति के लिए भी एक निश्चित और पूर्व-निर्धारित क्रम बाँधना पड़ता है, क्योंकि लोग फुरसत में नहीं हैं और उनकी जीवन – शैली व्यस्तताओं से भरी है। लोगों में एकाग्रता, नयापन और कल्पना का एकदम अभाव है सुख को वे अब एक मशीनी क्रिया मानने लगे हैं जो उनके अनुसार सम्पन्न हो ही जायेगी। `स्विच आन’ या `स्विच आफ’ का दृष्टिकोण घर कर गया है। परन्तु प्राकृतिक नियमों, क्रियाओं तथा चीजों को ऐसे आदेश नहीं दिया जा सकता जैसे कि हम सूर्य को कहें कि वह आधी रात को निकले, तथा वसंत को कहें कि वह शीत ऋतु में आ जाए। इसी तरह इच्छाओं तथा भावनाओं को हम आदेश दें कि वे एक निश्चित समय पर और विशेष परिस्थितियों में आएँ तो सम्भव नहीं।

आज भी परिवार की बड़ी-बूढ़ी और समझदार महिलाएँ स्वास्थ्य सुरक्षा के सभी उपायों, स्नेह की विधियों, योग-चिकित्सा विधियों तथा रोगों से बचाव और रोगों की चिकित्सा के अनुकूल भोजन की सारी जानकारी रखती हैं। सच तो यह है कि भारतीय महिलाओं के परम्परा को जीवित रखने के गुण की बदौलत ही आयुर्वेद आज भारतीय परिवारों में मौजूद है।

आयुर्वेद में तीन प्रकार की चिकित्सा-विधियाँ हैं – तार्किक, मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक। इस समय जिस रोग-निवारण पद्धति पर हम विचार कर रहे हैं वह तीसरे प्रकार की है। आध्यात्मिक से अभिप्राय वर्तमान संदर्भ में हमारी आंतरिक ऊर्जा अथवा आत्म-शक्ति से है (इसे आध्यात्मिक ऊर्जा भी कह सकते हैं)। आत्म -शक्ति अविनाशी है तथा अनंत एवं सर्वव्यापी ब्रह्मांडीय ऊर्जा के सम्पर्क में आ जाते हैं जिसे रोग-उन्मूलन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। जब आप अपने शरीर के एक अंग से बात करने का अभ्यास डाल लेंगे तो आपको उन सभी समस्याओं का पता लग जायेगा जो रोग के लिए जिम्मेदार हैं। रोगी भाग के प्रति एक चेतना आपके अंदर होनी चाहिए और हर समय आपको इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। आप अपनी समस्याओं का कारण खोजना सीख जायेंगे। धीरे- धीरे आप देखेंगे कि शरीर का वह भाग-विशेष भी आपसे बातें करने लगेगा। तब आपको ऐसा लगेगा जैसे आपने अपने आपको एक प्रकार से पुनः जान लिया है।